
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण लगभग पूरा होने के ऐतिहासिक क्षण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज फहराया। माहौल दिव्य था, नारे गूंज रहे थे — “जय श्री राम!”
लेकिन दूसरी तरफ एक आवाज़ और उठी — सांसद अवधेश प्रसाद की।
अवधेश प्रसाद की ‘दिल से निकली’ नाराज़गी
अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद इस बात से बेहद नाराज़ हैं कि उन्हें धर्म ध्वजारोहण समारोह में बुलाया ही नहीं गया।
उनका कहना है— “मुझे नहीं बुलाया गया क्योंकि मैं दलित समाज से आता हूँ। यह राम की मर्यादा नहीं, किसी और की संकीर्ण सोच है। मेरी लड़ाई पद की नहीं, सम्मान और बराबरी की है।”
राजनीतिक गलियारों में यह बात जंगल की आग की तरह फैली।
सियासी नोटिस में ‘राम की मर्यादा’ बनाम ‘निमंत्रण की राजनीति’
कार्यक्रम में मौजूद थे —
मोहन भागवत
सीएम योगी आदित्यनाथ
संत-धर्माचार्य
बड़े-बड़े वीआईपी
लेकिन अपने ही क्षेत्र के सांसद को बुलाना भूल गए!
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा ट्रेंड करने लगा, और अवधेश प्रसाद ने X पर लिखा कि न बुलाने का कारण “सिर्फ उनका दलित समाज से होना” है।

एक दिन पहले ही बोले थे — न्योता मिला तो नंगे पांव पहुँचूंगा
24 नवंबर को उन्होंने पोस्ट किया था- “अगर न्योता मिला तो सारा काम छोड़कर नंगे पांव पहुँच जाऊँगा।”
लेकिन निमंत्रण आया नहीं… और नाराज़गी बढ़ती चली गई।
राम मंदिर का सफ़र: 500 साल का संकल्प पूरा
पीएम मोदी ने इसे “युगांतकारी” बताते हुए कहा कि यह सदियों का दर्द भरने जैसा है। 5 अगस्त 2020 को नींव रखी गई, 22 जनवरी 2022 को प्राण प्रतिष्ठा हुई। अब, शिखर पर ध्वज फहरने के साथ मंदिर लगभग पूरी तरह तैयार है।
विवाद की वजह क्या?
- कार्यक्रम हाई-प्रोफाइल
- स्थानीय सांसद गायब
- दलित-नेता कार्ड
- सेंटर vs स्टेट vs लोकल इक्वेशन
- राजनीतिक तलब-खिंचाई का नया अध्याय
यह मुद्दा आने वाले दिनों में यूपी की राजनीति को गर्म रखने वाला है।
“201 में सिमटी Team India—SA बोला: बढ़त भी, दबदबा भी!”
